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ग्रीनफील्ड कॉलोनी फरीदाबाद

6 अप्रैल की दिल्ली हाई कोर्ट की सुनवाई में नहीं निकल सकी ग्रीनफील्डस कॉलोनी वासियों की किस्मत UIC के कानूनी चक्रव्यूह के बाहर ।

6 अप्रैल 2022 : रिपोर्ट : सच से रूबरू

जैसा कि सभी ग्रीनफील्डस वासियों को उम्मीद थी कि 6 अप्रैल को ग्रीनफील्डस कॉलोनी का स्टे केस खत्म हो जाएगा लेकिन उम्मीदों से विपरीत UIC के काबिल वकील साहब ने अपनी काबिलियत से एक बार फिर ग्रीनफील्डस कॉलोनी में डेवलपमेंट की उम्मीदों को फिर से बहुत दूर पहुंचा दिया है ।

जहां 10 फरवरी को कोर्ट ने आर्डर किया था कि सभी चारों   कंपनी अपील केसों  (क्रमश : 36/2011 GRWS, 37/2011 प्लाट होल्डर्स , 45/2011 पवन मित्तल व 79/ 2011 shareholders )को एक साथ मिला कर निस्तारण किया जाएगा और इस केस को NCLT में जल्द समाधान के लिए भेजा जाएगा लेकिन मास्टर स्ट्रोक खेलते हुए  UIC के काउंसिल ने  29 जनवरी 2014 के कोर्ट के आर्डर का हवाला देते हुए 10 फरवरी के हुए आर्डर को कमज़ोर कर दिया है । इससे केस और लंबी अवधि के लिए लंबित रहेगा । एक प्रत्यक्षदर्शी ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि ग्रीनफील्डस कॉलोनी के विकास को और दूर बनाने वाले इस आर्डर को सुनते ही वहां मौजूद कंपनी के मैनेजर प्रवीण कुमार की खुशियों का ठिकाना न रहा और वह बहुत ही उल्लास में दिखाई दिए और उन्होंने अपने वकील साहब को इस आदेश के लिए बधाइयाँ दीं । साथ ही वहाँ मौजूद grws के वीरेंद्र भड़ाना, वी के टंडन व प्लॉट होल्डर्स सोसाइटी के पदाधिकारियों ने भी एक दूसरे को बधाई देते हुए अपनी खुशी का इजहार किया ।

सालाना 40 लाख से लेकर 50 लाख खर्च करती है UIC ग्रीनफील्डस कॉलोनी पर स्टे बनाये रखने के लिए :

जी हां ,, ग्रीनफील्डस कॉलोनी की कॉलोनाइजर अर्बन इम्प्रूवमेंट कंपनी UIC बहुत ही भारी भरकम रकम खर्च करती है ग्रीनफील्डस कॉलोनी पर स्टे बनाये रखने के लिए । यह वही पैसा है जो UIC यहां के निवासियों के पानी के बिल, इंसिडेंटल चार्ज / म्युटेशन चार्ज  सिक्योरिटी चार्ज आदि के रूप में निवासियों से इक्कठा करती है जो की विकास कार्यों में खर्च होनी चाहिए लेकिन बदकिस्मती से ये कॉलोनी के विकास को रोकने के लिए ही इस्तेमाल हो रही है । यह बहुत ही ज्यादा गंभीर विषय है ।

ढाई साल में लगभग एक करोड़ रुपये से अधिक दे चुकी है UIC लीगल खर्चा के बतौर :

अगर इस पैसे को सड़क में लगाया गया होता तो अभी तक ग्रीनफील्डस कि समस्त सड़कों का निर्माण हो गया होता साथ ही बिजली और पानी की समस्या भी जड़ से खत्म हो गई होती । ग्रीनफील्डस कॉलोनी का सम्पूर्ण विकास हो जाता लेकिन कुछ लोगों के गठजोड़ से ऐसा हो न सका ।

GRWS ने तोड़ा कमिश्नर यशपाल यादव और ASM  के समक्ष किया हुआ स्टे केस वापिस लेने का वादा :

ASM ग्रीनफील्डस के प्रधान आचार्य आदित्य शर्मा ने बताया कि आवासीय सुधार मंडल ASM ने 11 अक्टूबर 2022 को ग्रीनफील्डस के MCF द्वारा  टेकओवर के लिए MCF कमिश्नर साहब को एक ज्ञापन सौंपा था ।

इस पर कार्यवाही करते हुए 26 नवंबर को सुनवाई रखी गयी थी। जिसमे उन्होंने कमिशनर साहब को बताया कि GRWS के केस की वजह से स्टे लगा हुआ है । इसको संज्ञान में लेते हुए 21 दिसंबर को कमिश्नर साहब द्वारा सभी की जॉइंट मीटिंग रखी गयी थी । जिसमे साहब में GRWS के प्रधान से स्टे वापस लेने का अनुरोध किया था और इस पर सभी 11 लोगों के सामने स्टे केस वापस लेने का वादा किया था।

लेकिन ग्रीनफील्डस वासियों को धोखे में रखते हुए अभी तक केस वापिस नहीं लिया गया है । यह बहुत ही दुखद है और ग्रीनफील्डस वासियों के साथ एक बहुत बड़ा धोखा है।

प्लाट होल्डर एसोसीएशन भी है ग्रीनफील्डस कॉलोनी की तरक्की की  राह में रोडा :

प्लाट होल्डर association भी है ग्रीनफील्डस केस में पार्टी  जिन्होंने कंपनी अपील 37/2011 दिल्ली हाई कोर्ट में  दायर कर रखी है। इस संस्था  के आफिस , मेंबर्स पदाधिकारी , चुनाव , संचालन आदि की जानकारी यहाँ के अधिकांश निवासियों  को नहीं है  और न ही फरीदाबाद में इनका आफिस है और यह भी नहीं पता कि कौन बिल्डर लॉबी को ये फायदा पहुंचाना चाहते हैं ।

इससे ग्रीनफील्डस वासियों के ही हितों का नुकसान हो रहा है ।

हरयाणा सरकार के द्वारा वापस किये गए edc के ब्याज के लगभग  {22.5 + 6}= 28 करोड़ रुपये  जमा है  UIC के बैंक के खाते में :

यह रकम ग्रीनफील्डस कॉलोनी के निवासियों में वितरित होनी है व ग्रीनफील्डस कॉलोनी के विकास हेतु प्रयोग होनी है लेकिन 4 साल से UIC ने इन जमा पैसों की ब्रेकअप नहीं बना कर दी है अदालत को जिसकी वजह से ये बैंक एकाउंट में फ्रीज़ हैं। UIC को डर है कि अगर इसकी ब्रेकअप बना कर अदालत को देदी तो ये रकम से ग्रीनफील्डस कॉलोनी का विकास न हो जाये ।

स्टे से मिल रहा है  shareholder और UIC को अटूट फायदा :

जैसा कि सभी को पता है कि UIC के पास  बिना बिके 48 रिहायसी प्लाट हैं और 25 विशाल इंस्टिट्यूशन प्लाट हैं । जिनकी कीमत आज की तारीख में 300 करोड़ रुपये से भी ऊपर है। लेकिन फिर भी UIC यहां के निवासियों से कभी सड़क की भागीदारी स्कीम , बिजली  के 30 हज़ार का ड्राफ्ट , अनैतिक incidental चार्ज आदि के रूप में उनकी जेब पर सरासर डाका डाल रही है । यह एक बहुत बड़ा scam है  । कॉलोनी को यहां के  निवासियों से डेवेलोप का खर्चा करवा कर , इस बड़ी रकम को साफ बचा ले जाएंगे।

क्या है वो 2011 का  CLB का आदेश जिसके खिलाफ की गई है अपील ।

आवासीय सुधार मंडल ग्रीनफील्डस के महासचिव अधिवक्ता सन्नी खंडेलवाल ने बताया कि 2009 में अर्बन कंपनी UIC के तत्कालीन डायरेक्टर के द्वारा 48 प्लॉटों कीगैर कानूनी तरीके से, 1982 के अदालत के आदेश के खिलाफ, संदेहजनक नीलामी की गई थी । इस पर शेयर होल्डर्स ने 2009 में CLB ट्राइब्यूनल में एक वाद दायर किया था ।

जिसका फैसला 2011 में आया था और जिसमे  CLB ट्राइब्यूनल ने आदेश दिया था की एक डायरेक्टर गवर्मेंट ऑफ इंडिया की तरफ से और एक शेयर होल्डर्स (uic के असली मालिक ) की तरफ से नियुक्त किया जाए ताकि UIC के प्लाटों व संपत्तियों को शयरहॉल्डर्स बेच कर कॉलोनी का विकास करवा सकें और कॉलोनी को MCF में हैंडओवर किया जा सके लेकिन GRWS और प्लाट होल्डर्स के द्वारा इस ग्रीनफील्डस कॉलोनी की जनता के हक में आए इन आदेश पर कैस नो 36 व 37 अपील दायर कर स्टे ले लिया गया था । जिस वजह से कॉलोनी में निवासियों को बिजली, सड़क और अनैतिक इन्सिडेन्टल चार्ज अपनी खून पसीने की कमाई से देने पड़ रहे हैं और कॉलोनी MCF में नहीं जापा रही है । इसके बाबजूद भी यहाँ के हालत बहुत बदतर होते जा रहे हैं ।

उन्होंने यह भी बताया की uic के नियोजक , grws के पदाधिकारी, बिल्डर्स और प्लॉट होल्डर्स संस्था के पदाधिकारियों का यह गठजोड़ ग्रीनफील्डस की जनता के लिए एक दुर्भाग्यपूर्ण अभिशाप की तरह है जिसकी वजह से यहाँ का विकास होना एक दम असंभव के समान है लेकिन वह ग्रीनफील्डस कॉलोनीवासियों के भाग्य को इस चक्रव्हीयू से बाहर निकालने की पूरी कोशिश करेंगे । इसके लिए उन्होंने ग्रीनफील्डस कॉलोनी के सभी सीनियर अधिवक्ताओं से मदद करने की अपील की है ।

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