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ग्रीनफील्ड कॉलोनी फरीदाबाद

क्यों ग्रीनफील्डस कॉलोनी फसी है कानूनी चंगुल में और कौन होने नहीं दे रहा कॉलोनी का विकास ।

24 अप्रैल 2022

आखिर क्यों नहीं हो रहा है ग्रीनफील्डस कॉलोनी का विकास । आखिर किस वजह से लटक गया है ग्रीनफील्डस कॉलोनी का विकास । आखिर कौन हैं वो लोग जो रोक रहे हैं कॉलोनी का विकास । आखिर क्या है 2011 के दिल्ली उच्च न्यायालय के स्टे केस की सच्चाई । 

जैसा कि सभी ग्रीनफील्डस वासियों को उम्मीद थी कि 6 अप्रैल २०२२ को ग्रीनफील्डस कॉलोनी का दिल्ली हाइ कोर्ट में स्टे केस खत्म हो जाएगा लेकिन उम्मीदों से विपरीत स्टे लेने वालों के काबिल वकील ने अपनी काबिलियत से एक बार फिर ग्रीनफील्डस कॉलोनी में डेवलपमेंट की उम्मीदों को फिर से बहुत दूर पहुंचा दिया है ।

जहां 10 फरवरी को कोर्ट ने आर्डर किया था कि सभी चारों कंपनी अपील केसों  (क्रमश : 36/2011 GRWS जिसके प्रधान कोई बिंदे भड़ाना  हैं, 37/2011 प्लाट होल्डर्स , 45/2011 पवन मित्तल व 79/ 2011 shareholders )को एक साथ मिला कर निस्तारण किया जाएगा और इस केस को NCLT में जल्द समाधान के लिए भेजा जाएगा लेकिन मास्टर स्ट्रोक खेलते हुए इस केस को और लंबा खींच दिया गया है । 

क्या है वो 2011 का CLB का आदेश जिसके खिलाफ की गई है अपील ।

2009 में अर्बन कंपनी UIC के तत्कालीन डायरेक्टर के द्वारा 48 प्लॉटों की गैर कानूनी तरीके से, 1982 के अदालत के आदेश के खिलाफ, संदेहजनक नीलामी की गई थी । इस पर शेयर होल्डर्स ने 2009 में CLB ट्राइब्यूनल में एक वाद दायर किया था ।

जिसका फैसला 2011 में आया था और जिसमे CLB ट्राइब्यूनल ने आदेश दिया था की एक डायरेक्टर गवर्मेंट ऑफ इंडिया की तरफ से और एक assistant डायरेक्टर शेयर होल्डर्स (UIC के असली मालिक ) की तरफ से नियुक्त किया जाए जिससे  UIC के 49 रेसिडेंटिशल और 25 ear marked इंस्टिट्यूशनल प्लाट को auction कर कॉलोनी को डेवेलोप कराया जाएगा और उसके बाद MCF में hand ओवर कर दिया जयेगा। लेकिन GRWS और प्लाट होल्डर्स के द्वारा इस ग्रीनफील्डस कॉलोनी की जनता के हक में आए इन आदेश पर कैस नो 36 व 37 अपील दायर कर स्टे ले लिया गया था और कॉलोनी के विकास के लिए फंड्स पर स्टे लग गया । जिस वजह से कॉलोनी में निवासियों को बिजली, सड़क और अनैतिक इन्सिडेन्टल चार्ज अपनी खून पसीने की कमाई से देने पड़ रहे हैं और कॉलोनी MCF में नहीं जापा रही है । यहाँ के हालत बहुत बदतर होते जा रहे हैं ।

GRWS और PHRA (Plot Holders Cum Residents Association) द्वारा MCF में जाने से रोकने और डेवलपमेंट को रोकने के लिए स्टे लिया गया है उससे हम सभी निवासियों को बे वजह मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है । इसकी वजह से हमारी कॉलोनी में विकास नहीं हो पा रहा है । 

GRWS ने तोड़ा कमिश्नर यशपाल यादव और आवासिए सुधार मण्डल (ASM) के समक्ष किया हुआ दिल्ली हाइ कोर्ट स्टे केस वापिस लेने का वादा:

ग्रीनफील्डस की आवासीय सुधार मण्डल rwa के महासचिव अधिवक्ता सन्नी खण्डेलवाल ने खुलासा किया कि आवासीय सुधार मंडल ASM ने 11 अक्टूबर 2021 को ग्रीनफील्डस के MCF द्वारा  टेकओवर के लिए MCF कमिश्नर साहब को एक ज्ञापन सौंपा था ।

इस पर कार्यवाही करते हुए 26 नवंबर को सुनवाई रखी गयी थी। जिसमे उन्होंने कमिशनर साहब को बताया कि GRWS के केस की वजह से स्टे लगा हुआ है । इसको संज्ञान में लेते हुए 21 दिसंबर को कमिश्नर साहब द्वारा सभी की जॉइंट मीटिंग रखी गयी थी । जिसमे कमिश्नर साहब ने GRWS के प्रधान से स्टे वापस लेने का अनुरोध किया था और इस पर सभी 11 लोगों के सामने स्टे केस वापस लेने का वादा GRWS के प्रधान ने किया था।

लेकिन ग्रीनफील्डस वासियों को धोखे में रखते हुए अभी तक केस वापिस नहीं लिया गया है । यह बहुत ही दुखद है और ग्रीनफील्डस वासियों के साथ एक बहुत बड़ा धोखा है।

प्लाट होल्डर एसोसीएशन भी है ग्रीनफील्डस कॉलोनी की तरक्की की  राह में रोडा :

प्लाट होल्डर association भी है ग्रीनफील्डस केस में पार्टी  जिन्होंने कंपनी अपील 37/2011 दिल्ली हाई कोर्ट में  दायर कर रखी है। इस संस्था  के आफिस , मेंबर्स पदाधिकारी , चुनाव , संचालन आदि की जानकारी यहाँ के अधिकांश निवासियों को नहीं है  और न ही फ़रीदाबाद में इनका आफिस है और यह भी नहीं पता कि कौन बिल्डर लॉबी को ये फायदा पहुंचाना चाहते हैं ।

ढाई साल में लगभग एक करोड़ रुपये से अधिक दे चुकी है UIC लीगल खर्चा के बतौर  :

इन केसों के चलते ग्रीनफील्डस कॉलोनी की कॉलोनाइजर अर्बन इम्प्रूवमेंट कंपनी UIC को भी बहुत ही भारी भरकम रकम खर्च करनी पड़ रही है । हर साल करीब 40 से लेकर 50 लाख तक कानूनी केसों में मजबूरन खर्च करना पड़ रहा है । 

यह वही पैसा है जो UIC यहां के निवासियों के पानी के बिल, इंसिडेंटल चार्ज / म्युटेशन चार्ज  सिक्योरिटी चार्ज आदि के रूप में निवासियों से इक्कठा करती है जो की विकास कार्यों में खर्च होनी चाहिए लेकिन बदकिस्मती से ये कॉलोनी के विकास को रोकने के लिए ही इस्तेमाल हो रही है । यह बहुत ही ज्यादा गंभीर विषय है ।

2011 का clb अदालत का निर्णय ग्रीनफील्डस के निवासियों के पक्ष में था :

शेयर होल्डर्स कॉलोनी को डेवेलप करना चाहते हैं जैसे ग्रीन पार्क और ग्रीन पार्कएक्सटेंशन दिल्ली में डेवेलोप की है । क्या 50 और साल तक इस कॉलोनी को बिना सब स्टेशन, बिना बिजली, बिना पानी, बिना सड़क, सारे illegal खुले रास्ते, बिना सिक्योरिटी के ऐसे ही लटके रहना देना ठीक है? इस स्टे की वजह से dead lock में फस  गया है ग्रीनफ़ील्ड का डेवलपमेंट । MCF के मिनिट्स में क्लियर लिखा है कि इनकी सभी प्रॉपर्टी को encumber किया जाएगा स्टे हटने के बाद ।

grws नाम की एक संस्था (जिसके प्रधान कोई बिंदे बड़ाना हैं ) का स्टे लेना क्यों है आश्चर्यजनक :

2011 के आर्डर में क्लियर लिखा है कि एक मेन डायरेक्टर सेंट्रल गवर्मेंट का बनेगा और additional डायरेक्टर shareholders की तरफ से बनेगा ताकि ठीक तरीके से ऑक्शन हो सके । बॉम्बे हाई कोर्ट से शेयर होल्डर्स की dispute अब खत्म हो चुकी है । शेयर होल्डर्स ने दिल्ली हाई कोर्ट मे कॉलिनी को डेवेलोप करने का affidavit भी दे रखा है । 1982 के आर्डर के खिलाफ एक चौथाई रेट में टेंडर क्यों हुए थे 2009 में केवल auction ही हो सकती है । 2010 में GRWS ने affidavit फ़ाइल किया था इस इल्लीगल टेंडेंर को सही ठहराने के लिए, इनका क्या VESTED इंटरेस्ट था एक चौथाई रेट में प्लाट की SALE होने में ?

शेयर होल्डर का कंट्रोल सेंट्रल govt के appointed director के हाथों में  दिया था 2011 के निर्णय मे, तोह GRWS को  क्या प्रॉब्लम है ? कोई निजी स्वार्थ है जिसकी वजह से जनता में झूठ फैला रहे हैं की शेयर होल्डर्स प्लॉटों को बेच कर भाग जाएंगे ?  CLB के आदेश में स्पष्ट रूप से para 16 में लिखा हुआ है और para 17 में लिखा हुआ है कि GOVT appointed director auction कर MCF में कॉलोनी को हैंड ओवर करवाये । 

लेकिन GRWS और PHRA ने इस पर स्टे ले लिया, कोरी  और काल्पनिक कहानी से कॉलोनी वासियों की मिट्टी खराब कर रहे हैं ।ये स्पष्ट है कि ये स्टे उन्होंने अपने किसी निजी PERSONAL VESTED INTEREST के वशीभूत होकर लिया है । इसलिए सभी निवासियों से निवेदन है कि एक जुट होकर ग्रीनफील्डस के भाग्य पर लगे  इस स्टे को वापिस लेने की मांग करें |

MCF में जाने के बाद सारी सड़क, बिजली, पानी सब MP Fund और MLA FUND से हो जाता । 10 साल में अगर 8 करोड़ MP fund और 2 करोड़ MLA का लगता ग्रीनफील्डस में तो 10 साल में 100 करोड तो यही हो गए । इस स्टे केस से UIC के management को भी बहुत फायदा है इसलिए जनता को मुर्ख बनाया जा रहा है । 

ग्रीनफील्डस की आवासीय सुधार मण्डल rwa के महासचिव अधिवक्ता सन्नी खण्डेलवाल ने वार्ता के दौरान बताया कि प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में शेयर होल्डर्स ही मालिक होते है, Bombay हाई कोर्ट का फैसला हो गया है ,,,शेयर होल्डिंग्स भी decide हो चुकी है, इसलिए उनका एक डायरेक्टर तो बनेगा ही, वो तो तय है फिर स्टे लगा के लेट क्यों कर रहें है  ।

जब 12 अप्रैल की डेट मिल जाती तो वकील ने 29 अप्रैल की डेट क्यों ली? केस को लेट करना बहुत ही खेदजनक है।

ग्रीनफील्डस की आवासीय सुधार मण्डल के प्रधान आचार्य आदित्य शर्मा ने बताया कि “ग्रीनफील्ड्स कॉलोनी का हस्तांतरण आज तक नगर निगम में नही हो पाया है। कॉलोनी का विकास पूरी तरह अर्बन इम्प्रोवेमेंट कंपनी पर निर्धारित है जो पूर्ण विकास एवं हमारी बुनयादी सुविधाओं को प्रदान करने में पूर्णतया सक्षम नही है | वर्ष 2015 से आवासीय सुधार मण्डल (रैजिस्टर्ड) आरडबल्यूए ग्रीन फील्ड्स कॉलोनी, कॉलोनी के सम्पूरण विकास करवाने हेतु निस्वार्थ सेवा भावना से कार्यरत है!कॉलोनी में विभिन्न व्यवस्थाओं को जैसे बिजली ,पानी,सड़क ,पार्क इत्यादि इत्यादि के सुधार हेतु निरंतर प्रयास करती रहती है | लेकिन इस अनैतिक स्टे के कारण ग्रीनफील्ड्स कॉलोनी का विकास अधर में लटका हुआ है |”

“आवासीय सुधार मंडल की टीम इस विषय पर गम्भीरता से हर सम्भव प्रयास कर रही है ताकि हमारी कॉलोनी MCF के अंतर्गत आ सके | समय समय से आपको जानकारी उपलब्ध करवाते रहेंगे |” उन्होंने सभी ग्रीनफील्डस वासियों से यह भी अपील की है की ज्यादा से ज्यादा संख्या में आवासीय सुधार मण्डल ग्रीनफील्डस के मेम्बर बनकर संस्था को मजबूती से कॉलोनी के विकास के लिए लड़ाई लड़ने के लिए शक्ति प्रदान करें ।

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